भारत AI Superpower बनेगा, लेकिन क्या हर भारतीय AI तक पहुंच पाएगा?

कल मैंने 1973 की फिल्म Namak Haraam देखी।

फिल्म पुरानी है। भारत भी उस समय से बहुत आगे आ चुका है। हमारी अर्थव्यवस्था (economy) कई गुना बड़ी हो चुकी है, टेक्नोलॉजी (technology) ने हमारी जिंदगी बदल दी है और आज हम Artificial Intelligence (AI) की दुनिया में एक बड़ी ताकत (AI Superpower) बनने की बात कर रहे हैं।

लेकिन फिल्म देखने के बाद मेरे मन में एक सवाल रह गया। क्या आम भारतीय के लिए वास्तव में उतना बदला है, जितना हम सोचते हैं? इस सवाल का जवाब आसान नहीं है।

भारत ने बहुत प्रगति की है। आज इंटरनेट और स्मार्टफोन पहले से कहीं ज्यादा लोगों तक पहुंच चुके हैं। Digital payments ने छोटे से छोटे बिज़नेस को भी बदल दिया है। आज एक छोटे शहर का व्यक्ति भी दुनिया के किसी हिस्से में बैठे व्यक्ति से बात कर सकता है।

लेकिन अवसर (opportunity) अभी भी बराबर नहीं है। और अब हम AI के दौर में प्रवेश कर रहे हैं।

AI की बात करने से पहले एक अहम सवाल

हम आज कहते हैं कि AI भारत की productivity को कई गुना बढ़ा सकता है। हम कहते हैं कि:

  • AI Education (शिक्षा) बदल देगा।
  • AI Healthcare (स्वास्थ्य) बदल देगा।
  • AI Agriculture (कृषि) बदल देगा।
  • AI Small Businesses (छोटे व्यापार) को ग्लोबल बना देगा।

मैं इन बातों से सहमत हूं। लेकिन मैं एक और सवाल पूछना चाहता हूं: AI का फायदा किसे मिलेगा?

2025-26 में भारत की per capita net national income लगभग ₹2.08 लाख सालाना है। लेकिन average income पूरी कहानी नहीं बताती। World Inequality Lab के estimates के अनुसार 2022-23 में भारत के bottom 50% लोगों को national income का लगभग 15% हिस्सा मिला, जबकि top 10% के पास लगभग 57.7% income थी।

Wealth inequality इससे भी ज्यादा है। Top 10% के पास लगभग 65% wealth थी, जबकि bottom 50% के पास लगभग 6.4%।

ये सिर्फ statistics नहीं हैं। इनका सीधा संबंध technology की पहुंच (accessibility) से है।

Laptop सिर्फ एक Device नहीं, एक Opportunity है

हम अक्सर कहते हैं कि आज technology सबके हाथ में है क्योंकि smartphone लगभग हर जगह दिखाई देता है। लेकिन smartphone और computer एक जैसे नहीं हैं।

AI सीखना, programming करना, design बनाना, data analysis करना, automation बनाना, remote work करना या कोई digital business शुरू करना—इनमें से बहुत से काम laptop या computer पर कहीं ज्यादा आसानी से किए जाते हैं।

और यहां भारत की वास्तविकता सामने आती है। 2022-23 के सरकारी survey के अनुसार केवल 9.9% Indian households के पास computer था। Rural India (ग्रामीण भारत) में यह आंकड़ा सिर्फ 4.2% था。

इसका अर्थ मेरे लिए बहुत बड़ा है। हम एक तरफ एक युवा से कह रहे हैं: AI सीखो, Coding सीखो, Automation सीखो, Global market में काम करो। लेकिन दूसरी तरफ शायद उसके घर में computer ही नहीं है।

एक ₹30,000 या ₹40,000 का laptop किसी के लिए सामान्य खर्च हो सकता है। लेकिन किसी सीमित आय वाले परिवार के लिए वही laptop कई महीनों की बचत हो सकता है। यही वह जगह है जहां मुझे लगता है कि हमारी AI conversation अधूरी है।

Technology Inequality को कम भी कर सकती है और बढ़ा भी सकती है

Technology अपने आप में अच्छी या बुरी नहीं होती। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी पहुंच किसके पास है।

अगर AI केवल उन लोगों की productivity बढ़ाता है जिनके पास पहले से अच्छी education, laptop, high-speed internet, English language skills और financial resources हैं, तो AI inequality को और बढ़ा सकता है

एक highly skilled professional AI की मदद से अपना काम दो घंटे में कर सकता है। लेकिन जिस युवा के पास computer ही नहीं है, उसके लिए वह productivity revolution अभी शुरू ही नहीं हुआ।

यही कारण है कि मुझे लगता है कि भारत को AI के साथ एक दूसरा mission भी रखना चाहिए: AI Accessibility.
सिर्फ AI बनाना नहीं, बल्कि AI को लोगों तक पहुंचाना।

AI Accessibility: सरकार क्या कर सकती है?

मुझे लगता है कि सरकार इस दिशा में बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है। हमारे पास पहले से Digital India, IndiaAI और Skill India जैसे बड़े initiatives हैं। लेकिन हमें technology access को केवल internet access तक सीमित नहीं रखना चाहिए।

कुछ practical models पर विचार किया जा सकता है:

  1. हर छोटे शहर और कस्बे में affordable community computer centres
  2. Refurbished laptops को students और low-income entrepreneurs तक पहुंचाने के programmes।
  3. Libraries में AI और computer labs की स्थापना।
  4. Local languages (स्थानीय भाषाओं) में AI education।
  5. Students के लिए subsidised या shared computing access।
  6. CSR funds को सिर्फ infrastructure बनाने के बजाय measurable digital empowerment पर लगाना।

और सबसे महत्वपूर्ण—technology को केवल English तक सीमित न रखना। अगर भारत के करोड़ों लोग अपनी भाषा में AI से बात कर सकें, सीख सकें और काम कर सकें, तो इसका economic impact बहुत बड़ा हो सकता है।

जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं है

यहां private companies की भी अहम भूमिका है। हम entrepreneurs अक्सर सोचते हैं: Customer कौन है? वह कितना pay करेगा? हम अपना product कितने में बेच सकते हैं?

ये जरूरी सवाल हैं। लेकिन शायद हमें एक और सवाल पूछना चाहिए: जिस व्यक्ति के पास पैसे नहीं हैं, क्या हम उसके लिए भी कुछ बना सकते हैं?

हर company charity नहीं कर सकती, और हर technology free भी नहीं हो सकती। लेकिन business model ऐसा जरूर हो सकता है जिसमें technology की कीमत किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति के कारण उसके लिए पूरी तरह inaccessible न हो।

  • कुछ users premium product के लिए pay कर सकते हैं।
  • CSR programmes access को fund कर सकते हैं।
  • Technology companies अपने products का low-cost या community version बना सकती हैं।

मुझे लगता है हमें ऐसे hybrid models के बारे में ज्यादा सोचना चाहिए।

मैं खुद क्या करना चाहता हूं?

यह सवाल मेरे लिए सिर्फ theoretical नहीं है। मैं एक entrepreneur हूं और technology और business के intersection पर काम करता हूं। इसलिए अगर मैं AI की accessibility की बात करता हूं, तो मुझे अपनी तरफ से भी कुछ करने की जिम्मेदारी लेनी होगी।

मैं government institutions, NGOs, CSR organisations, educational institutions, और technology companies के साथ मिलकर ऐसे models पर काम करने के लिए तैयार हूं। मेरी तरफ से contribution सिर्फ पैसे का नहीं होगा:

  • Technology
  • Business knowledge
  • Team का समय
  • Product development
  • Training

मुझे funding मांगने से ज्यादा interest collaboration में है। अगर कोई organisation या व्यक्ति इस problem को लेकर serious है, तो मैं उसके साथ बैठकर यह समझना चाहता हूं कि practically क्या किया जा सकता है।

भारत को सिर्फ Technology Consumers नहीं बनाने हैं

मेरे हिसाब से भारत की सबसे बड़ी opportunity यह है कि हम technology को consumption से production की तरफ ले जाएं।

  • एक गरीब परिवार का बच्चा सिर्फ YouTube पर AI के बारे में न देखे, वह AI का इस्तेमाल करके काम भी कर सके।
  • एक छोटे शहर का युवा सिर्फ LinkedIn पर remote jobs न देखे, वह वास्तव में global client के लिए काम कर सके।
  • एक छोटा व्यापारी सिर्फ digital payment स्वीकार न करे, वह digital tools का इस्तेमाल करके अपना business बढ़ा सके।

यही technology का वास्तविक democratisation होगा।

1973 से 2026 तक का सफर

Namak Haraam 1973 में आई थी। आज 2026 है। इन 53 वर्षों में भारत बहुत बदल गया है। लेकिन inequality, opportunity और economic mobility के सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।

आज हमारे पास पहले से कहीं ज्यादा powerful technology है। लेकिन अब हमारी अगली जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि इन technologies का फायदा सिर्फ उस व्यक्ति को न मिले जो पहले से privileged है।

अगर हम ऐसा कर पाए, तो AI सिर्फ एक technological revolution नहीं रहेगा। यह social and economic mobility का सबसे बड़ा tool बन सकता है। भारत का AI superpower बनना अच्छी बात है, लेकिन मेरे लिए उससे भी बड़ा लक्ष्य है:

भारत का हर वह व्यक्ति जो सीखना और काम करना चाहता है, उसे technology के कारण पीछे न रहना पड़े।

क्योंकि अंत में किसी देश की technological progress इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसके पास कितने powerful computers या AI models हैं। उसे इस बात से मापना चाहिए कि उन technologies ने कितने लोगों को अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर दिया।

और शायद यही वह बदलाव है जिसकी हमें अगली पीढ़ी के भारत में जरूरत है।

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